(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.10. अध्यायः 010
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
रुरुडुण्डुभसंवादः॥ 1 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

रुरुरुवाच। 1-10-0x(49)(1040)
मम प्राणसमा भार्या दष्टासीद्भुजगेन ह।
तत्र मे समयो घोर आत्मनोरग वै कृतः॥ 1-10-1(1041)
भुजंगं वै सदा हन्यां यं यं पश्येयमित्युत।
ततोऽहं त्वां जिघांसामि जीवितेनाद्य मोक्ष्यसे॥ 1-10-2(1042)
डुण्डुभ उवाच। 1-10-3x(50)
अन्ये ते भुजगा ब्रह्मन्ये दश्तीह मानवान्।
डुण्डुभानहिगन्धेन न त्वं हिंसितुमर्हसि॥ 1-10-3(1043)
एकानर्थान्पृथग्धर्मानेकदुःखान्पृथक्सुखान्।
डुण्डुभान्धर्मविद्भूत्वा न त्वं हिंसितुमर्हसि॥ 1-10-4(1044)
सौतिरुवाच। 1-10-5x(51)
इति श्रुत्वा वचस्तस्य डुण्डुभस्य रुरुस्तदा।
नावधीद्भयसंविग्नमृषिं मत्त्वाऽथ डुण्डुभम्॥ 1-10-5(1045)
उवाच चैनं भगवान्रुरुः संशमयन्निव।
केन त्वं भुजग ब्रूहि कोऽसीमां विक्रियां गतः॥ 1-10-6(1046)
डुण्डुभ उवाच। 1-10-7x(52)
अहं पुरा रुरो नाम्ना ऋषिरासं सहस्रपात्।
सोऽहं शापेन विप्रस्य भुजगत्वमुपागतः॥ 1-10-7(1047)
रुरुरुवाच। 1-10-8x(53)
किमर्थं शप्तवान्कुद्धो द्विजस्त्वां भुजगोत्तम।
कियन्तं चैव कालं ते वपुरेतद्भविष्यसि॥ ॥ 1-10-8(1048)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि पौलोमपर्वणि दशमोऽध्यायः॥ 10 ॥

Mahabharata - Adi Parva - Chapter Footnotes
1-10-3 अहिगन्धेन सर्पसादृश्यमात्रेण॥ 1-10-4 एकानर्थान् एकः समानः अनर्थः जनकर्तृकहिंसादिरूपो येषां तान्। पृथक् सर्पजात्युचितप्राणहरणादिविलक्षणो धर्मो लक्षणं येषां ते। एकं तुल्यं बिलेशयत्वादिरूपं दुःखं येषां तान्। पृथक् हविर्भागादिभ्यो भिन्नं भेकभक्षणादि सुखं येषां तान्। धर्मवित् कृतापराधस्यैव दण्डो नत्वन्यस्येति धर्मस्तज्ज्ञः॥ दशमोऽध्यायः॥ 10 ॥


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